संदेश

आज फिर से ख़ामोशी हैं लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गुलाब

चित्र
                                                      गुलाब मोहब्बत का  एक गुलाब उनको भी, जो मोहब्बत के दुश्मन हैं, एक गुलाब उनको भी, जो नफ़रत के नारे लगाते हैं। एक गुलाब उनको भी, जो हाथों में कटार लिए घूमते हैं, एक गुलाब उनको भी, जो अल्प-वस्त्र देख उत्तेजित होते हैं। एक गुलाब उनको भी, जो दूसरों को ही 'बाप' (आका) समझते हैं, एक गुलाब उनको भी, जो प्रेम को ही शत्रु मानते हैं। एक गुलाब उनको भी, जो मासूमों की मौत पर खुशियाँ मनाते हैं, एक गुलाब उनको भी, जो रंगों में भी धर्म ढूँढते हैं। एक गुलाब उनको भी, जो मज़हब देख कर घर देते हैं, एक गुलाब उनको भी, जो धर्म को अपनी आड़ बनाते हैं। एक गुलाब उनको भी, जो भड़काऊ नारों से दुश्मन बनाते हैं, एक गुलाब उनको भी, जो अपनों को आपस में लड़वाते हैं। एक गुलाब उसको भी, जो दंगा करा खुद छुप जाते हैं, एक गुलाब उसको भी, जो जाति में ऊँच-नीच समझते हैं। एक गुलाब उनको भी, जो दोस्तों की आँखें भी फिरा देते हैं, एक गुलाब ...

आज फिर से ख़ामोशी हैं,

चित्र
आज फिर से ख़ामोशी हैं आ ज फिर से ख़ामोशी हैं, आज फिर से कोई रोया हैं।  देखो तो सही कही कोई इंसा भूखा सोया हैं।  तुम भी जाओ, वो भी जाएँ, देखो कोई रह न जाये, सब जाएँ।  देखना हैं मुझको, इस खामोशी में कोई दफन तो नहीं।    वास्ता पूछते हो मेरा उससे, देखो तो सही खुद अपना भी पता मालूम नहीं।  खुद चले हो दीवाना होने के लिए, और कहते हो तुम दीवाने हो।  ज़रा संभलना, कही उस घर की मिटटी में कुछ अपनी सी खुशबू तो नहीं।   न जाने बदलो में कोन सी गुफ़्तगू हुई, बारिश के बीच भी एक होड़ सी हुई। में रोकता रह गया, मेरा ही घर सेहर में था, वही बारिश हुई।  अब टूटे घर में पानी, पानी हैं. जब उसने पूछा, कोई यहाँ दफ़न तो नहीं।  ख़ामोश रहता तो सायद आज में भी खुशगवार होता।  किसी ने मुझे चढ़ा कर अपना मुफीद सीधा कर लिया। .  इस ख़ामोशी का अंदाजा कही यूं ही तो नहीं।   कही मैं,मैं न रहूं, कही तुम तू न रहों ।  लेखक  इज़हार आलम देहलवी  writerdelhiwala.com  हम गरीब तो न थे पर गरीब से कुछ कम न थे , जब पूछा,...